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उत्तराखण्ड सामान्य ज्ञान : उत्तराखंड के प्रमुख मेले

उत्तराखण्ड सामान्य ज्ञान : उत्तराखंड के प्रमुख मेले

उत्तराखण्ड प्रतियोगी परीक्षाओं UKSSSC , UKPSC,UBTER में उत्तराखंड सामान्य ज्ञान के अंतर्गत मेलों से सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते हैं। इस आलेख में हम आपको राज्य  में आयोजित होने वाले प्रमुख मेलों की विस्तृत जानकारी दे रहे हैं।  जो आपकी आगामी समूह ग परीक्षाओं के लिए अति महत्वपूर्ण है। 

उत्तराखण्ड सामान्य ज्ञान : उत्तराखंड के प्रमुख मेले


  • गौचर मेला ( गौचर चमोली )
  • झण्डा साहिब मेला ( देहरादून )
  • गणनाथ मेला – ताकुला (अल्मोड़ा)
  • पूर्णागिरी मेला – टनकपुर
  • बग्वाल मेला – देवीधुरा (चम्पावत)
  • लड़ी धुरा मेला – चम्पावत
  • मानेश्वर मेला – मायावती आश्रम (चम्पावत )
  • दनगल मेला – पौड़ी
  • चन्द्रबदनी मेला – टिहरी
  • रण भूत कौथिक – टिहरी गढ़वाल
  • तिमुड़ा मेला – जोशीमठ
  • नुणाई मेला – जौनसार क्षेत्र
  • टपकेश्वर मेला – देहरादून
  • कुम्भ मेला – हरिद्वार
  • पिरान कलियर मेला – रुड़की
  • अटरिया मेला – रुद्रपुर
  • सिद्ध बलि जयंती मेला – कोटद्वार
  • वीर गब्बर सिंह मेला – टिहरी गढ़वाल
  • ताडकेश्वर मेला – पौड़ी
  • सुरकंडा मेला – टिहरी गढ़वाल
  • कण्डक मेला – उत्तरकाशी
  • वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली स्मृति मेला – पौड़ी गढ़वाल
  • शहीद केशरी चन्द मेला – चकराता
  • बसंत बुरांश मेला – चमोली
  • नाग टिब्बा मेला – जौनपुर (टिहरी गढ़वाल)
  • जाखौली मेला – चकराता
  • शहीद भवानी दत्त जोशी मेला – थराली (चमोली)
  • खरसाली मेला – उत्तरकाशी
  • सेलकु मेला – उत्तरकाशी
  • क्वानु मेला – चकराता
  • खकोटी उत्सव – पौड़ी गढ़वाल
  • हिलजात्रा उत्सव – पिथोरागढ़

मौण मेला- 

मछली मारने का यह लोकोत्सव उत्तराखण्ड के पालीपछांऊ तथा जौनसार एवं रर्वाई-जौनपुर के क्षेत्रों में मनाया जाता है। मौण का शाब्दिक अर्थ विष होता है। यह तिमूर अथवा अटाल(एक वनस्पति) की छाल को सुखाने के बाद उसका चूर्ण बनाकर तैयार किया जाता है।इस चूर्ण को खल्टों(बकरी की खाल से बनाये गये थैलों) में भर कर इस अवसर के लिए रख दिया जाता है। और मेले के दिन नदी के मुहाने पर डाल दिया जाता है। नदी के संकरे मार्ग पर पत्थरों की दीवार बना कर उसके प्रवाह को दूसरी ओर मोड़ दिया जाता है। जिससे मछली वाले गढढों के रूके हुए पानी मे मौण का गहन प्रवाह हो सके। जिससे रूके हुए पानी की मछलीयां अचेतन होकर पानी के उपर आ जाती है और लोग उन्हें बटोरनेमें लग जाते हैं। मौण का उत्सव तीन रूपों में मनाया जाता था पहला माछीमौण,दूसरा जातरामौण,तीसरा ओदीमौण। इनमें प्रथम दो का आयोजन अभी भी किया जाता है किन्तु तीसरा ओदीमौण जो सामन्तो व जमींदारों के शक्ति पदर्शन के साथ हुआ करता था अब अतीत का विषय बन गया है। जातरमौण का आयोजन 12 वर्षों के अन्तराल से हुआ करता है। कुमाउ में भी इसी प्रकार का उत्सव मनाया जाता है जिसे डहौ उठाना कहते हैं 

चैती मेला (बाला सुन्दरी मेला)

चैती मेला उधम सिंह नगर जिले के काशीपुर के कुण्ड़ेश्वरी देवी मंदिर में लगता है , कुण्ड़ेश्वरी कुमाऊं में चन्द राजाओ की कुलदेवी मानी जाती है|

रणभू कीथौग-

 इस उत्सव का आयोजन टिहरी जनपद नैलचामी पटटी के अर्न्तगत ढेला गांव में कार्तिक महिने में किया जाता है। यह आयोजन राजशाही के समय विभिन्न युद्वों में मारे गये रणबांकुरों की स्मृति में किया जाता है। इसमें विशेष रूप से रणभूत नृत्यों का आयोजन किया जाता है। 

नौढ़ा कौतिक-

 उत्तराखण्ड के इस लोकोत्सव का आयोजन गढ़वाल मंडल के रूद्रप्रयाग जनपद में कर्णप्रयाग-गैरसेंण मार्ग पर नारायणगंगा के तट पर स्थित आदिबदरी के पवित्र देवस्थल में वैसाख मांस में किया जाता है। इस मेले को लटमार मेला भी कहा जाता है। इस अवसर पर व्यावसायिकक्रय विक्रय भी होता है। इस मेले में भी स्याल्दे के बिखोती के मेले के समान ही पिंडवाली और खेतीवाल लोगों के बीच मंदिर के प्रांगण पर अधिकारकरने के लिए लट्टों का प्रयोग किया जाता है। 

लखवाड़ का मेला-

 इस लोकोत्सव का आयोजन सितम्बर-अक्टूबर में मसूरी से दूर जौनसार बाबर के जनजातिय क्षेत्र चकराता में किया जाता है। 

सनीगाढ़ का मेला- 

इस उत्सव का आयोजन जिला बागेश्वर के कपकोट विकास खण्ड में सनीगाढ़-नवलिंग के देवालय में होता है। 

हरेला कर्क संक्रान्ति- 

कुमांऊ ऋतुउत्सवों में हरियाले का स्थान सबसे उपर है। जिस दिन हरेला बोया जाता है उसी दिन से हरेला का आयोजन हो जाताहै। इस उत्सव में घर की महिलाएं शुद्ध स्थान से मिट्टी खोदकर लाती हैं तथा उसे सुखा कर छाान लेती हैं। तथा फिर पंच या सप्त धान्यों जैसे धान,मकई,उड़द,गहत, तिल,भट्ट आदि को मिश्रीत करके इसमें बो देती हैं। इस उत्सव में इसे बोने का कार्य महिलाओं तथा सिंचीत करने का कार्य कुवारी कन्याओं का होता है। इस त्यौहार पर विशेष तौर पर वृक्षारोपण के तौर पर बनाया जाता है।

 चैती उत्सव-: 

यह बोक्सा समाज का कृषि से जुडा हुआ प्रमुख लोकोत्सव है। जो वर्ष के प्रारम्भ में अर्थात चैत्रमास में मनाया जाता है।इस उत्सव में नये कृषि उत्पादों का उपभोग वर्जीत होता है। जब तक कि सम्बद्व देवी देवताओं को विशेषकर काशीपुर वाली देवी को न चढ़ा दिया जाए।

 हिलजात्रा-: 

यह भी कुमाउं मंडल के पिथौरागढ़ जनपद को सोर घाटी में मनाया जाता है। यह वर्षाकाल में प्रारम्भ में कृषक वर्ग द्वारा अभिनीत किया जानेवाला विशुद्व लोक नाट्य है। कृषि से सम्बद्व होने के कारण ही इसमें अभिनय करने वाले पात्रो का रूप भी तदअनुरूप ही होता है।

 खतड़वा-:

 खतड़वा का उत्सव केवल कुमाउ में वर्षाकाल की समाप्ति व शरद ऋतु के आगमन में कन्या संक्रान्ति को मनाया जाता है। यह कुमाउं के पशुचारक वर्गीय समाज का एक विशेष लोकोत्सव है।

 नुणाई उत्सव-: 

पशुचारकों से सम्बद्व यह पशूत्सव देहरादून जनपद के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बाबर के खत पटटी के भटाड़ गांव में मनाया जाता है।इसमें जंगलो में निवास करने वाले बकरवाल व मेषपालक अवश्य ही अपने पशुओ के रेवड़ों को लेकर घर आते हैं। तथा अपने पशुओं के रक्षक देवता सिलगुरू जी को अर्पित कर फिर भेड़-बकरियों के नाम पर शिरवा चढ़ाते हैं। 

गिर का कौतिक- 

इस मनोरंजन लोकोत्सव अल्मोड़ा जनपद के मासी क्षेत्र में तुनाचौर के मैदान में तथा तल्ला सल्ट में चनुली गांव के निकटस्थ मैदान में मकरसंक्रान्ति के दिन किया जाता है। इस क्रीडा में भाग लेने वाले खिलाड़ी तथा दर्शक नियत मैदान में आकर एकत्र होते हैं।

 गिन्दी उत्सव या गेंद का मेला- 

मकर संक्रान्ति के अवसर पर दक्षिणी गढ़वाल के यमकेश्वर विकास में थल के निकटस्थ मैदान में लगने वाला यह प्रसिद्ध मैला है।

जौलजीवी मेला

जौलजीवी मेला उत्तराखंड के पिथोरागढ़ जनपद के काली एवं गौरी नदियों के संगम पर स्थित जौलजीवी नामक स्थान पर प्रतिवर्ष 14 से 19 नवम्बर तक लगता है , इस मेले की शुरुआत 1914 में हुई थी|

बिस्सू मेला

यह मेला उत्तरकाशी जनपद के कई स्थानों पर बैसाखी के दिन लगता है

नंदादेवी मेला

नंदादेवी मेली उत्तराखंड में भाद्र शुक्ल पक्ष की पंचमी से अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर, मिलम आदि कई स्थानों पर लगता है

श्रावणी मेला

श्रावणी मेला अल्मोड़ा के जागेश्वर में श्रावण मॉस में एक महीने तक लगता है|
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